Hartalika Teej Puja Vidhi
The austere monsoon fast of Goddess Parvati to win Lord Shiva, featuring sand idol puja and the complete Tapasya Katha.
आवश्यक पूजा सामग्री (Required Samagri)
- Natural clay or river sand (Balu) to sculpt Shiva-Parvati and Ganesha
- Bilva leaves (Belpatra), Dhatura fruit and flower, Shamipatra, and Mandar flowers
- Suhag box with 16 shringar items for Mother Parvati
- Yellow and white cloth for deities
- Panchamrit, fresh fruits, cucumber, and coconut
- Incense, camphor, and four-wick ghee diya (Akhand Deep)
पूजा विधि क्रम (Step-by-Step Procedure)
- Observe a strict Nirjala fast (without food and water) on Bhadrapada Shukla Tritiya.
- In the evening (Pradosh Kaal), sculpt Shiva, Parvati, and Ganesha from clean river sand or clay.
- Decorate a beautiful canopy (mandap) with banana trunks and fresh flowers.
- Perform shodashopachara puja offering Belpatra and Dhatura to Shiva, and Suhag samagri to Parvati.
- Recite the Hartalika Teej Vrat Katha narrating Parvati's Himalayan penance.
- Sing devotional bhajans and keep a night vigil (Ratri Jagran) in prayer.
- Perform morning aarti the following day, offer prasad, and immerse the clay idols respectfully in water.
हरतालिका तीज पावन व्रत कथा
माता पार्वती द्वारा भगवान शिव को पति रूप में वरण करने हेतु की गई कठोर तपस्या और सखियों द्वारा हरण की अमर गाथा।
भगवान शिव ने स्वयं माता पार्वती को उनके पूर्व जन्म का स्मरण कराते हुए यह पावन कथा सुनाई थी:
'हे पार्वती! पूर्व जन्म में तुमने मुझे पति रूप में पाने के लिए हिमालय पर्वत पर घोर तपस्या की थी। तुमने बारह वर्षों तक केवल सूखे पत्ते चबाकर, कड़ाके की ठंड में जल में खड़े रहकर और ग्रीष्म ऋतु में पंचाग्नि तपकर कठोर साधना की थी।
तुम्हारी यह कठिन तपस्या देखकर तुम्हारे पिता पर्वतराज हिमालय अत्यंत चिंतित हो गए। उसी समय देवर्षि नारद वहां पहुंचे और हिमालय से बोले — 'महाराज! आपकी कन्या के लिए भगवान विष्णु से उत्तम वर तीनों लोकों में नहीं है। मैं भगवान विष्णु का प्रस्ताव लेकर आया हूं।'
पर्वतराज ने सहर्ष विष्णु जी से विवाह का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। जब तुम्हें इस बात का पता चला, तो तुम अत्यधिक दुखी हो गईं क्योंकि तुमने अपने मन में मुझे (शिव को) पति रूप में वरण कर लिया था।
तुम्हारा विलाप देखकर तुम्हारी सखियों ने कारण पूछा। तब तुमने अपने हृदय की बात कही। तुम्हारी सखियां तुम्हें वन में एक गुप्त गुफा में ले गईं ताकि पिता तुम्हारी इच्छा के विरुद्ध विवाह न करा सकें। 'हरत' (हरण) और 'आलिका' (सखी) — सखियों द्वारा हरण कर वन में ले जाने के कारण ही इस व्रत का नाम 'हरतालिका' पड़ा।
उस घने जंगल में भाद्रपद शुक्ल तृतीया के दिन तुमने हस्त नक्षत्र में गंगा की बालू (रेत) से शिवलिंग का निर्माण किया और अन्न-जल का त्याग कर पूरी रात मेरा ध्यान और कीर्तन किया।
तुम्हारी उस अनन्य भक्ति और निष्ठा से प्रसन्न होकर मैंने साक्षात प्रकट होकर तुमसे वर मांगने को कहा। तुमने हाथ जोड़कर कहा — 'हे देवाधिदेव महादेव! यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं, तो मुझे अपनी अर्धांगिनी के रूप में स्वीकार कीजिए।' मैंने 'तथास्तु' कहकर तुम्हारी मनोकामना पूर्ण की। इसके उपरांत पर्वतराज भी तुम्हारी निष्ठा के आगे नतमस्तक हुए और विधिपूर्वक हमारा विवाह संपन्न हुआ।'
॥ बोलो उमा-महेश्वर भगवान की जय! ॥