Karwa Chauth Puja Vidhi

A step-by-step guide to the Karwa Chauth fast, evening thali puja, and the authentic Vrat Katha of Queen Veeravati & Karwa Mata.

आवश्यक पूजा सामग्री (Required Samagri)

  • A karwa (small earthen or metal pot with a spout) filled with water or milk
  • A thali with roli, akshat, a ghee diya, dhoop, and fresh flowers
  • Suhag samagri: sindoor, bindi, bangles, mehendi, and a small mirror
  • A sieve (chalni) for viewing the moon and husband's face
  • Sweets, dry fruits, and mathri or halwa-puri for sargi and bhog
  • An idol or photo of Goddess Parvati (Karwa Mata), Lord Shiva, Ganesha, and Kartikeya
  • A red cloth to lay on the puja chowki

पूजा विधि क्रम (Step-by-Step Procedure)

  1. Before sunrise, eat sargi — a nourishing pre-dawn meal traditionally given by the mother-in-law — to sustain the nirjala fast.
  2. Observe the nirjala fast (without food or water) from sunrise until moonrise.
  3. In the late afternoon or evening, gather with women for the sacred Karwa Chauth Vrat Katha, holding and rotating the puja thalis.
  4. Perform the puja to Goddess Parvati (Karwa Mata), Lord Shiva, Ganesha, and Kartikeya, offering roli, akshat, sindoor, and flowers.
  5. After moonrise, offer Arghya to the moon with the water from the Karwa.
  6. View the moon through the sieve, then look at your husband's face through the same sieve.
  7. The husband offers his wife water from the karwa and the first bite of sweets, formally breaking the fast.
  8. Touch the feet of elders and mother-in-law for blessings, concluding with a celebratory family feast.

करवा चौथ पावन व्रत कथा (रानी वीरावती एवं करवा माता की अमर कथा)

करवा चौथ की शाम सुहागिनें सोलह श्रृंगार कर एक वृत्त में बैठती हैं और थाली फेरते हुए रानी वीरावती और पतिव्रता करवा माता की यह अमर कथा सुनती हैं।

प्रथम कथा: रानी वीरावती की पावन कथा

प्राचीन काल में एक धर्मनिष्ठ साहूकार के सात पुत्र और एक रूपवती, गुणवती पुत्री थी जिसका नाम वीरावती था। सातों भाई अपनी अकेली बहन से अगाध स्नेह करते थे और उसे पलकों पर बिठाकर रखते थे। विवाह के उपरांत वीरावती अपने पहले करवा चौथ का व्रत करने मायके आई हुई थी। उसने सूर्योदय से पूर्व सरगी ग्रहण कर पति की दीर्घायु हेतु कड़ा निर्जला व्रत धारण किया। पूरे दिन अन्न-जल ग्रहण न करने के कारण संध्या होते-होते वीरावती भूख और प्यास से निढाल हो गई और मूर्छित होकर गिर पड़ी। भाइयों से अपनी लाडली बहन की यह दारुण दशा देखी न गई। उन्होंने वीरावती से भोजन कर लेने का अनुनय-विनय किया, परंतु धर्मपरायण वीरावती ने कहा — 'भाइयों! मैं चंद्रमा को अर्घ्य दिए बिना जल की एक बूंद भी ग्रहण नहीं कर सकती।' भाइयों ने एक युक्ति सोची। सबसे छोटे भाई ने एक ऊंचे वटवृक्ष पर जाकर दीपक प्रज्वलित किया और उसके आगे महीन छलनी रख दी, जिससे दूर से देखने पर ऐसा आभास हो मानो पूर्णिमा जैसा चंद्रमा उदित हो गया हो। भाइयों ने आकर वीरावती से कहा — 'बहन! चंद्रमा निकल आया है, उठो और अर्घ्य दे दो।' वीरावती ने भाइयों के स्नेह पर विश्वास कर उस कृत्रिम प्रकाश को ही चंद्रमा मान लिया और अर्घ्य देकर व्रत खोल लिया। जैसे ही उसने पहला कौर मुंह में डाला, उसे छींक आ गई; दूसरे कौर में बाल निकला; और जैसे ही तीसरा कौर उठाया, ससुराल से संदेशवाहक दौड़ा आया कि उसके पति की आकस्मिक मृत्यु हो गई है! वीरावती छाती पीट-पीटकर विलाप करने लगी। उसके आर्तनाद से द्रवित होकर देवराज इंद्र की पत्नी माता इंद्राणी (पार्वती जी) प्रकट हुईं। वीरावती ने रोते हुए चरणों में गिरकर पूछा — 'हे देवी! मुझ अभागिन से ऐसा क्या अपराध हुआ कि मेरा सुहाग छिन गया?' देवी ने स्नेह से समझाया — 'पुत्री! तुमने छल से उत्पन्न नकली चंद्रमा को देखकर अपना पवित्र निर्जला व्रत भंग कर दिया था, इसी कारण यह विपत्ति आई है।' वीरावती ने प्रायश्चित का मार्ग पूछा। देवी ने कहा — 'तुम वर्ष भर पड़ने वाली प्रत्येक चतुर्थी का निष्ठापूर्वक व्रत करो और अगले करवा चौथ पर पूरे विधि-विधान से निर्जला व्रत रखकर माता करवा की आराधना करो। तुम्हारा सुहाग पुनः लौट आएगा।' वीरावती ने अटूट श्रद्धा से पूरे वर्ष चतुर्थी व्रत किए और करवा चौथ पर माता पार्वती व करवा माता का ध्यान किया। माता के आशीर्वाद से यमराज ने उसके पति को जीवनदान दिया और वह पुनः अखंड सौभाग्यवती हो गई।

द्वितीय कथा: पतिव्रता करवा माता की अमर कथा

करवा चौथ की दूसरी कथा एक अत्यंत पतिव्रता स्त्री 'करवा' की है, जो अपने पति के साथ तुंगभद्रा नदी के तट पर कुटिया में रहती थी। एक दिन उसका पति नदी में स्नान करने गया। वहां जल के भीतर एक विशाल मगरमच्छ ने उसका पैर अपने जबड़ों में पकड़ लिया और उसे गहरे जल में खींचने लगा। मृत्यु को समीप देखकर पति ने अपनी पत्नी करवा को पुकारा — 'करवा! रक्षा करो!' करवा भागती हुई नदी तट पर पहुंची। उसने अपने पतिव्रत धर्म के तपोबल का स्मरण किया और कच्चे सूत के एक साधारण धागे से उस विशाल मगरमच्छ को एक वृक्ष के तने से बांध दिया। उसके तपोबल के आगे मगरमच्छ तनिक भी हिल न सका। इसके पश्चात करवा सीधे यमराज के दरबार में पहुंची। उसने यमराज से दृढ़तापूर्वक कहा — 'हे धर्मराज! उस मगरमच्छ ने मेरे निर्दोष पति का पैर पकड़ा था। आप उसे यमदंड देकर नरक में भेजें और मेरे पति को दीर्घायु प्रदान करें।' यमराज ने कहा — 'हे देवी! मगरमच्छ की आयु अभी शेष है और तुम्हारे पति की आयु पूर्ण हो चुकी है, अतः मैं ऐसा नहीं कर सकता।' करवा ने निर्भीक होकर कहा — 'हे प्रभु! यदि आपने मेरे पति के प्राणों की रक्षा नहीं की और उस दुष्ट ग्राह को दंड नहीं दिया, तो मैं अपने सतीत्व और तपोबल के तेज से आपको भस्म होने का शाप दे दूंगी!' यमराज उस पतिव्रता के अलौकिक तेज से विस्मित और भयभीत हो गए। उन्होंने तुरंत मगरमच्छ को यमलोक दंडित करने हेतु भेजा और करवा के पति को सौ वर्ष की सुदीर्घ आयु का वरदान दिया। यमराज ने आशीर्वाद दिया — 'हे करवा! तुम्हारे इस अगाध पातिव्रत्य के कारण कार्तिक कृष्ण चतुर्थी सदैव 'करवा चौथ' के नाम से पूजी जाएगी। जो स्त्री इस दिन तुम्हारा स्मरण कर व्रत रखेगी, उसका सुहाग कभी अकाल मृत्यु को प्राप्त नहीं होगा।' ॥ बोलो करवा माता की जय! ॥

तृतीय भाग: थाली फेरने का विधान, दोहा एवं पारण

कथा के दौरान महिलाएं अपनी थाली को दाईं ओर से बाईं ओर घुमाते हुए सात बार फेरती हैं और यह पारंपरिक मंगल गीत गाती हैं: 'वीरा आई करवे ले, हाथ में मेंहदी, मांग में सिंदूर ले। सात सुहागन थाली फेरे, सुहाग की अमर निशानी ले॥' थाली फेरते समय सात बार यह दोहा दोहराया जाता है: 'सदा सुहागन रहो, पुत्र-पौत्र से संपन्न रहो। करवा माता की कृपा से घर-आंगन में सुख-शांति का वास हो।' कथा समाप्त होने के उपरांत करवे पर रोली से तेरह बिंदियां लगाई जाती हैं। सास अथवा जेठानी के चरण स्पर्श कर 'बायना' (वस्त्र, मिठाई और फल) भेंट किया जाता है और उनका शुभाशीर्वाद प्राप्त किया जाता है। रात्रि में चंद्रमा को अर्घ्य देकर ही पति के हाथों जल पीकर उपवास तोड़ा जाता है।