Satyanarayan Puja Vidhi

A step-by-step guide to performing Satyanarayan Puja at home with the authentic 5-chapter Vrat Katha, dedicated to Lord Vishnu.

आवश्यक पूजा सामग्री (Required Samagri)

  • A photo or idol of Lord Vishnu/Satyanarayan
  • A wooden platform (chowki) and a clean cloth (preferably yellow) to cover it
  • A kalash (pot) filled with water, topped with mango leaves and a coconut
  • Panchamrit (a mix of milk, curd, honey, ghee, and sugar)
  • Roli, chandan, akshat (rice), flowers, and durva grass
  • Bananas, and ingredients for the prasad (sooji/rava halwa is traditional, Panjiri and Charanamrit)
  • Incense sticks, a diya, camphor, and a bell
  • Betel leaves (paan), supari, clove (laung), and cardamom (elaichi)

पूजा विधि क्रम (Step-by-Step Procedure)

  1. Bathe and wear clean clothes, then clean the puja area and set up the chowki with the yellow cloth.
  2. Place the kalash near the chowki and the image of Lord Satyanarayan on it.
  3. Begin with a short Ganesh Puja, invoking Lord Ganesha for an auspicious, obstacle-free start.
  4. Perform the Kalash Puja, invoking the presence of the sacred rivers and deities within it.
  5. Invoke Lord Satyanarayan with roli, chandan, flowers, and akshat, offering panchamrit and then bathing the idol/image if applicable.
  6. Listen to or read the Satyanarayan Katha (the five chapters narrating the story and significance of the vrat).
  7. Perform the aarti with a lit diya, ringing the bell, followed by offering the prasad (typically sooji halwa with fruits).
  8. Distribute the prasad to all present, as sharing it is considered an essential part of the puja.

श्री सत्यनारायण व्रत कथा (सम्पूर्ण ५ अध्याय)

स्कंद पुराण के रेवाखंड में वर्णित श्री सत्यनारायण व्रत कथा के पांचों अध्याय भगवान विष्णु के सत्य स्वरूप और शरणागति की महिमा प्रकट करते हैं। पूजा में इन अध्यायों का श्रवण एवं पठन अत्यंत फलदायी है।

प्रथम अध्याय: नारद-नारायण संवाद एवं व्रत का महात्म्य

एक समय नैमिषारण्य तीर्थ में शौनकादिक ऋषियों ने परम ज्ञानी सूत जी से विनीत भाव से पूछा — 'हे महामुने! कलियुग में प्राणी नाना प्रकार के सांसारिक कष्टों और व्याधियों से पीड़ित रहते हैं। कृपया ऐसा कोई सरल एवं कल्याणकारी उपाय बताएं जिससे अल्प प्रयास से ही मनुष्यों के समस्त क्लेश दूर हों और उन्हें मनोवांछित फल तथा अंत में मोक्ष प्राप्त हो सके।' सूत जी बोले — 'हे ऋषियों! यही प्रश्न एक बार देवर्षि नारद जी ने भगवान श्री हरि विष्णु से पूछा था। एक समय नारद जी तीनों लोकों का भ्रमण करते हुए मृत्युलोक पहुंचे। वहां मनुष्यों को अपने-अपने पूर्व संचित कर्मों के अनुसार विभिन्न दुखों से त्रस्त देखकर उनका करुणामय हृदय द्रवित हो उठा। वे तुरंत क्षीरसागर पहुंचे, जहां शंख, चक्र, गदा, पद्म धारी, मेघश्याम भगवान नारायण विराजमान थे। नारद जी ने करबद्ध होकर स्तुति की — 'हे देवाधिदेव! आप अनादि, अनंत और शरणागतवत्सल हैं। मृत्युलोक के प्राणी घोर कष्ट भोग रहे हैं। कृपा कर ऐसा कोई व्रत बताइए जो सर्वसुलभ हो।' भगवान नारायण मुस्कुराते हुए बोले — 'हे वत्स नारद! तुमने लोककल्याण की भावना से बड़ा सुंदर प्रश्न किया है। स्वर्ग और पृथ्वी दोनों लोकों में एक अत्यंत दुर्लभ परंतु शीघ्र फलदायी व्रत है — वह है 'श्री सत्यनारायण व्रत'। जो मनुष्य सत्य का आचरण करते हुए श्रद्धापूर्वक सत्यनारायण भगवान का पूजन करता है, वह इस लोक में सभी सुख भोगकर अंत में परम पद को प्राप्त करता है। यह व्रत किसी भी पूर्णिमा, संक्रांति या शुभ प्रहर में किया जा सकता है।'

द्वितीय अध्याय: निर्धन शतानंद ब्राह्मण एवं काष्ठ विक्रेता की कथा

सूत जी ने आगे कहा — 'हे मुनियों! अब इस व्रत के प्रभाव का प्राचीन इतिहास सुनो। काशी की रमणीय नगरी में शतानंद नाम का एक अत्यंत दरिद्र ब्राह्मण रहता था। वह प्रतिदिन भिक्षा मांगकर किसी प्रकार अपना व अपने परिवार का भरण-पोषण करता था। भूख-प्यास से व्याकुल वह दिन-रात भटकता रहता था। उसकी निश्छल भक्ति देखकर भगवान विष्णु एक वृद्ध ब्राह्मण का रूप धारण कर उसके समक्ष प्रकट हुए और बोले — 'हे विप्रवर! तुम इतने दुखी और चिंताग्रस्त क्यों दिखाई देते हो?' ब्राह्मण ने अपनी दरिद्रता का सारा वृत्तांत कह सुनाया। तब वृद्ध ब्राह्मण रूपी भगवान ने कहा — 'सत्यनारायण भगवान सर्वमनोकामना पूर्ण करने वाले हैं। तुम श्रद्धापूर्वक उनका व्रत और पूजन करो।' भगवान ने उसे विधि बताई कि सवा सेर (या सामर्थ्यानुसार) गेहूं का आटा, शक्कर, दूध, घी और केले मिलाकर 'सपाद' (सवाया) प्रसाद तैयार करे और बंधु-बांधवों सहित कथा सुने। ब्राह्मण ने उसी रात निश्चय किया और अगले दिन भिक्षा में मिले धन से सत्यनारायण भगवान की पूजा की। प्रभु की कृपा से उसके सभी कष्ट दूर हो गए और वह समृद्ध हो गया। एक दिन जब ब्राह्मण कथा कर रहा था, तभी एक प्यासा और निर्धन लकड़हारा लकड़ी का गट्ठर सिर पर रखे वहां आया। उसने पूजा देखी, चरणामृत व प्रसाद ग्रहण किया और व्रत की महिमा जानी। उसने मन ही मन संकल्प लिया — 'आज बाजार में लकड़ी बेचने से जो भी धन मिलेगा, उसी से मैं भी सत्यनारायण भगवान का पूजन करूंगा।' उस दिन बाजार में उसकी लकड़ी साधारण मूल्य से दोगुने दाम पर बिकी। लकड़हारे ने प्रसन्नचित्त होकर केले, शर्करा, घी, दूध और पंचामृत लेकर अपने मित्रों सहित विधि-विधान से सत्यनारायण व्रत किया। भगवान की कृपा से वह भी धन-धान्य और संतान सुख प्राप्त कर अंत में वैकुंठ धाम को गया।

तृतीय अध्याय: साधु वैश्य की कथा एवं राजा चंद्रकेतु का कारागार

सूत जी बोले — 'ऋषियों! अब एक और रोचक कथा सुनो। प्राचीन काल में उल्कामुख नाम का एक धर्मात्मा राजा था, जो अपनी पत्नी सहित भद्रशीला नदी के तट पर सत्यनारायण व्रत कर रहा था। उसी समय साधु नाम का एक धनवान वणिक (व्यापारी) अपनी नौका लेकर वहां आया। उसने राजा से व्रत के विषय में पूछा। राजा ने बताया कि यह सत्यनारायण भगवान का व्रत है, जिससे समस्त सांसारिक सुख और संतान की प्राप्ति होती है। वणिक निसंतान था। उसने संकल्प लिया — 'यदि प्रभु कृपा से मुझे संतान प्राप्त हुई, तो मैं यह व्रत अवश्य करूंगा।' घर लौटने पर उसकी पतिव्रता पत्नी लीलावती ने गर्भधारण किया और समय आने पर एक रूपवती कन्या को जन्म दिया, जिसका नाम कलावती रखा गया। लीलावती ने पति को वचन की याद दिलाई, परंतु साधु वैश्य ने कहा कि कन्या के विवाह के समय व्रत करेंगे। जब कलावती विवाह योग्य हुई, तो उसका विवाह कंचननगर के एक योग्य वणिक पुत्र से करा दिया गया, किंतु साधु वैश्य ने विवाह के बाद भी व्रत नहीं किया और व्यापार में लीन रहा। सत्य के प्रति प्रमाद करने के कारण भगवान सत्यनारायण रुष्ट हो गए। वैश्य अपने दामाद के साथ व्यापार हेतु समुद्र तट पर स्थित राजा चंद्रकेतु के रत्नसारपुर नगर में गया। उसी रात राजा के कोषागार से कुछ चोर धन चुराकर भाग रहे थे। राजसैनिकों को आते देख चोरों ने चुराया हुआ खजाना उसी वैश्य और दामाद की दुकान में छिपा दिया और भाग निकले। सैनिकों ने वहां राजा का खजाना पाकर दोनों व्यापारियों को चोर समझा और जंजीरों में बांधकर राजा चंद्रकेतु के समक्ष प्रस्तुत किया। राजा ने बिना जांच किए दोनों को अंधेरी कोठरी में डाल दिया और उनका सारा धन जब्त कर लिया। भगवान के कोप से वणिक के घर पर भी चोरों ने सारा धन लूट लिया, जिससे लीलावती और कलावती भी दाने-दाने की मोहताज हो गईं।

चतुर्थ अध्याय: पश्चाताप, मुक्ति एवं दंडी संन्यासी की परीक्षा

सूत जी ने कहा — 'इधर भूख से व्याकुल कलावती एक दिन भोजन की तलाश में भटकते हुए एक ब्राह्मण के घर पहुंची, जहां लोग श्रद्धापूर्वक श्री सत्यनारायण की कथा सुन रहे थे। कलावती ने आदर से कथा सुनी और प्रसाद ग्रहण कर घर लौटी। उसने माता लीलावती से कहा कि ब्राह्मण के घर सत्यनारायण व्रत हो रहा था, जिससे सभी कष्ट दूर हो जाते हैं। लीलावती को अपने पति का विस्मृत संकल्प याद आ गया। उसने रोते हुए प्रभु से क्षमा मांगी और तत्काल रिश्तेदारों को बुलाकर विधिपूर्वक सत्यनारायण भगवान का पूजन किया और पति तथा दामाद के सकुशल लौटने की प्रार्थना की। भगवान सत्यनारायण प्रसन्न हुए। उन्होंने उसी रात राजा चंद्रकेतु को स्वप्न में दर्शन देकर कहा — 'हे राजन! जिन दोनों वणिकों को तुमने बंदी बनाया है, वे निर्दोष हैं। कल प्रातःकाल ही उन्हें मुक्त करो और उनका सारा धन लौटाओ, अन्यथा तुम्हारा राज्य और वैभव नष्ट हो जाएगा।' राजा ने प्रातःकाल सभा बुलाकर दोनों को कारागार से मुक्त कराया, उनका धन दुगुना करके लौटाया और नए वस्त्र देकर ससम्मान विदा किया। दोनों नौका में बैठकर अपने नगर की ओर चल पड़े। कुछ दूर जाने पर भगवान सत्यनारायण ने एक दंडी संन्यासी का रूप धरकर वैश्य की परीक्षा लेने हेतु पूछा — 'हे वणिक! तुम्हारी इस नौका में क्या भरा है?' वैश्य ने उपहास करते हुए झूठ बोला — 'महाराज! इसमें क्या रखा है, केवल लता और सूखे पत्ते भरे हैं।' संन्यासी रूपी भगवान ने कहा — 'तथास्तु! तुम्हारी बात सत्य हो।' इतना कहकर वे जल के तट पर बैठ गए। जब वैश्य ने नौका में देखा, तो सारा सोना-चांदी सचमुच सूखे पत्तों में बदल चुका था! वैश्य मूर्छित होकर गिर पड़ा। होश आने पर दामाद के कहने पर उसने संन्यासी के चरणों में गिरकर क्षमा याचना की। भक्तवत्सल भगवान ने मुस्कुराते हुए उसका धन पुनः लौटा दिया। जब वैश्य अपने नगर के तट पर पहुंचा, तो उसने घर दूत भेजा। लीलावती और कलावती उस समय सत्यनारायण की पूजा कर रही थीं। पति के आगमन की खबर सुनकर कलावती उत्सुकता में भगवान का प्रसाद छोड़ कर तट की ओर दौड़ पड़ी। प्रसाद का अनादर होते देख भगवान अप्रसन्न हो गए और दामाद सहित नौका जल में विलीन हो गई। कलावती विलाप करने लगी। लीलावती ने तुरंत समझकर सत्यनारायण भगवान की शरण ली और कलावती ने लौटकर प्रेमपूर्वक प्रसाद ग्रहण किया। तब प्रभु की अनुकंपा से नौका और दामाद दोनों सुरक्षित प्रकट हो गए।

पंचम अध्याय: राजा तुंगध्वज की कथा एवं प्रसाद का सर्वोच्च महात्म्य

सूत जी बोले — 'हे मुनिश्रेष्ठों! अब इस व्रत का अंतिम पावन अध्याय सुनो। प्राचीन काल में तुंगध्वज नाम का एक प्रतापी राजा था। वह अपनी प्रजा का पालन तो करता था, परंतु उसे अपने ऐश्वर्य और राजसत्ता का अत्यधिक अहंकार था। एक बार राजा तुंगध्वज वन में शिकार खेलने गया। शिकार से थककर वह एक विशाल वटवृक्ष की छाया में विश्राम करने बैठा। वहां उसने देखा कि आसपास के गांव के ग्वाले (गोपगण) अत्यंत प्रेम और भक्ति से भगवान श्री सत्यनारायण का पूजन कर रहे थे और भावविभोर होकर कीर्तन कर रहे थे। राजा ने उन्हें देखकर भी अहंकारवश न तो भगवान को मस्तक झुकाया और न ही पूजा स्थल पर गया। जब ग्वालों ने पूजा संपन्न कर आदरपूर्वक राजा के समीप आकर पंचामृत और पंजीरी का प्रसाद अर्पित किया, तो राजा ने घमंड में आकर उस प्रसाद को वहीं भूमि पर छोड़ दिया और अपनी राजधानी लौट गया। जब राजा अपने राजमहल पहुंचा, तो उसके होश उड़ गए। उसने देखा कि उसका भरा-पूरा राज्य शत्रुओं द्वारा नष्ट कर दिया गया है और उसके सभी सौ पुत्र मृत पड़े हैं। चारों ओर हाहाकार मचा हुआ था। राजा को तुरंत अपनी भूल का भान हुआ कि यह सब सत्यनारायण भगवान और उनके पावन प्रसाद के अनादर का फल है। राजा तुंगध्वज ने अपना राजसी मुकुट उतारा और नंगे पैर उसी वन की ओर दौड़ पड़ा। वह उसी वटवृक्ष के नीचे पहुंचा और ग्वालों के साथ बैठकर अश्रुपूरित नेत्रों से भगवान सत्यनारायण की पूजा की और श्रद्धापूर्वक उस प्रसाद को ग्रहण किया जिसे उसने ठुकराया था। भगवान सत्यनारायण की असीम कृपा से उसके सभी सौ पुत्र जीवित हो उठे और उसका खोया हुआ राज्य वैभव सहित वापस मिल गया। राजा तुंगध्वज आजीवन सत्यनारायण भगवान का निष्ठापूर्वक व्रत करता रहा और अंत में वैकुंठ को प्राप्त हुआ। सूत जी ने शौनकादिक ऋषियों से कहा — 'जो मनुष्य कलियुग में इस दुर्लभ सत्यनारायण व्रत का अनुष्ठान करता है अथवा इस पावन कथा को एकाग्रचित्त होकर सुनता है, उसके दरिद्रता, रोग, भय और समस्त पाप समूल नष्ट हो जाते हैं। घर में सुख, शांति, संतान और आरोग्य का वास होता है।' ॥ इति श्री स्कंद पुराणे रेवाखंडे श्री सत्यनारायण व्रत कथा सम्पूर्णा ॥ ॥ बोलो श्री सत्यनारायण भगवान की जय! ॥